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vijendrasingh


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मेडिक्लेम की आवश्यकता की प्रासंगिकता …..

Posted On: 9 Aug, 2010  
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बिज़नेस कोच में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' आदरणीय विजेंद्र सिंह जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj

जहां तक मैंने साध्वी प्रज्ञा का विश्लेषण किया है, मुझे वे एक बेहद जुझारू और साहसी नारी लगी जो गलती से भीरु हिन्दुओं के कुल में पैदा हो गईं| कम ही मर्द इतने मर्दाने होते हैं जिनमे उनके जितना साहस हो| मजे की बात तो ये है कि सोहराबुद्दीन मामले में शासन प्रशासन मानवाधिकार की बात करता है और प्रज्ञा के मामले में ना नारी अधिकार की बात होती है न मानवाधिकार की! इतनी सारी मुखर नारियां जो न जाने कितनी बेतुकी बिन सर पैर की बातों के लिए मीडिया से लेकर ब्लॉग मंच तक हिला रही हैं उनकी नज़र नारी पर हो रहे इस अत्याचार पर क्यों नहीं पड़ती| मुझे तो लगता है स्त्रियों में सिर्फ बाहर दिखाने के लिए बहन-चारा हैं अन्दर से बस सास-बहू या देवरानी-जिठानी ही रही हैं वही रहेंगी| कहाँ हैं महिला ब्लोगर, महिला मुक्ति आन्दोलन? कहाँ हैं \'मुझे गर्व है कि मैं नारी हूँ\'? कहाँ चली गई लिखने की कला? क्या इसके लिए भी कोई पुरुष आगे आये तब आँख खुलेगी कि प्रज्ञा सिर्फ हिन्दू अभियोगी नहीं बल्कि एक नारी भी है? कहाँ गए नारी को सम्मान दिलाने वाले बुद्धिजीवी? आँखें खोलो और न्याय की फ़रियाद तो करो! भर दो जागरण जंक्शन का ब्लॉग मंच \'प्रज्ञा को न्याय दो के उदघोश से\'!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: vijendra singh bhadoria

विजेंद्र जी,इतिहास वही लिखता है जो जीतता है,और हारने वाले को खलनायक इसीलिए बनना पड़ता है यही शास्वत सत्य है और तथ्य है,रावण से लेकर हिटलर और सद्दाम से लेकर आजतक यही होता आया है,आजकल तो इसमें सूचना तंत्र बहुत बड़ी भूमिका निभाने लगा है,आप सूचना तंत्र को नियंत्रित करके कुछ भी स्थापित कर सकते हैं,वैसे भी डार्विन की 'theory of struggle for existance'आज ज्यादा प्रासंगिक है,एक कौम के रूप में हिन्दुओं को भी जागरूक होना पड़ेगा तथा जातिगत भेदभाव को मिटाकर संगठित होना पड़ेगा अगर अपना वजूद बनाये रखना है तो,वैसे हिन्दुओं के अतिसहनशील होने का इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता कि भारत धर्मनिरपेक्ष देश इसलिए है कि यहाँ ८५% आबादी हिन्दुओं की है,ऐसा तो तथाकथित विकसित देशों में भी नहीं है चाहे अमेरिका हो या ब्रिटेन,वहां christianity राजधर्म है,कहने का अर्थ मजबूत बनो, संगठित बनो नहीं तो मिट जाओगे,

के द्वारा: samta gupta kota

जिम्मेदार तो विजेंद्र जी हम सभी यानी आम जनता है,जो ना तो कश्मीर के लोगों से वाजिब पीड़ा पूछती है और न ही वो निकम्मी सरकार जिसे हमने अपने माननीय[?] सांसदों की मार्फ़त चुना है पाकिस्तानी साजिशों का जवाब देने मैं कामयाब है,वैसे नेहरु से लेकर तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद जिन्होंने आतंकवादियों को छोड़ने के बदले आज की विध्वंसक नेत्री[?] महबूबा मुफ्ती की बहन और अपनी बेटी रुबिया सईद को छुड़ाया था,और तबसे आज तक भी सभी सरकारें इस समस्या को लटकाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं,सरकार अपने लोगों के जान-माल की सुरक्षा कितनी शिद्दत से करती है इसकी सीख तो israeli सरकार से लेनी चाहिए,लेकिन अगर हमारी सरकार वैसी नहीं है तो इस देश की जनता यानी हम ही जिम्मेदार है,जनता वैसी ही सरकार और व्यवस्था पाती है जिसके लायक वो होती है,चूँकि मालिक तो जनता ही है,

के द्वारा: samta gupta kota




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